Friday, 12 January 2018

भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश 2014 द्वारा संशोधनों की सूची

भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश 2014 द्वारा संशोधनों की सूची

सरकार द्वारा किए गए संशोधनों की सूची नीचे दी जा रही है जिन पर मूल कानून में विचार नहीं किया गया।
 

अध्यादेश में स्पेशल कैटेगरी ऑफ प्रोजेक्ट्स (नई धारा 10A) का गठन किया गया जो मंजूरी की अनिवार्यता से अलग है। सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट जरूरतों की विशेषज्ञ समूह द्वारा समीक्षा की गई और बहु-फसली/कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण में इसे शामिल किया गया। श्रेणी के पांच चीजों में इंडस्ट्रियल कॉरिडोरों  और बुनियादी ढांचा और सामाजिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को शामिल किया गया। इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत परियोजनाएं भी शामिल हैं। चूंकि ज्यादातर अधिग्रहण इन दो श्रेणियों में आते हैं, इसलिए यह 2013 के मूल कानून के तहत निहित सुरक्षा उपायों को पूरी तरह समाप्त करने के प्रभाव से संबद्ध हैं।

 

रीट्रोस्पेक्टिव क्लॉज की धारा 24(2) में भी संशोधन किया गया। यह धारा इस कानून के प्रभावी होने के बाद से ही बेहद सक्रिय है और रोक आदेश पारित होने की स्थिति में मुकदमेबाजी के तहत खर्च होने वाले समय को अलग रखने के लिए इसमें संशोधन किया गया है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय की मुआवजा दिये जाने की तय परिभाषा को भी समाप्त किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने चुकाए जाने वाले मुआवजे को अदालत में जमा रकम के रूप में परिभाषित किया था। नई धारा में कहा गया है कि इस मकसद के लिए किसी खाते में चुकाई जाने वाली रकम पर्याप्त है। 

 

‘निजी इकाई’ की परिभाषा को बढ़ा कर इसमें स्वामित्व, भागीदारी, कंपनियों, निगमों, गैर-लाभकारी संगठनों और कानून के तहत अन्य संस्थाओं को शामिल किया गया है।

 

डिफॉल्ट नौकरशाहों को अब सिर्फ अभियोग के लिए मंजूरी मिलने के बाद ही अभियोग के दायरे में लाया सा सकेगा। गैर-संशोधित कानून में कानून के कार्यान्वयन के लिए काम कर रहे अधिकारियों के लिए नियमों के उल्लंघन के मामले में उन्हें दंडित करने के प्रावधान के साथ बड़ी जिम्मेदारी सुनिश्चित की गई है। हालांकि नई सरकार ने सिर्फ सरकार से मंजूरी के बाद ही उनके अभियोग की अनुमति के लिए संबद्ध धारा (धारा 87) में संशोधन किया है। अब अधिकारी जिम्मेदारी के सीमित भय के साथ कानून के कार्यान्वयन में आगे आ सकते हैं।

 

गैर इस्तेमाल वाली जमीन लौटाने के लिए प्रावधानों को छोटा बनाया गया है। अधिग्रहीत भूमि उसके मूल मालिक को लौटाए जाने की तय समय सीमा को कमजोर बना दिया गया है। गैर-संशोधित कानून में जोर देकर यह कहा गया है कि यदि भूमि का इस्तेमाल नहीं हुआ है तो भूमि (मूल मालिक या सरकारी भूमि बैंक को) पांच साल बाद लौटाई जानी चाहिए। हालांकि अध्यादेश में पांच साल की अवधि को अस्वीकार करने वाले क्लॉज में संशोधन किया गया है और अधिग्रहणकर्ता को वैकल्पिक रूप से किसी परियोजना की स्थापना के लिए विशेष अवधि मुहैया कराने की अनुमति दी गई है। इसका प्रभाव यह होगा कि अधिग्रहणकर्ता बगैर किसी जवाबदेही के किसी परियोजना को पूरा करने के लिए लंबी और पर्याप्त अवधि निर्धारित कर सकेगा।

 

कानून के कार्यान्वयन के लिए सरकार को मिले विशेष अधिकारों में इजाफा किया गया है। गैर-संशोधित कानून ने सरकार को दो वर्षों के लिए पारित होने के बाद कानून के कार्यान्वयन के लिए कोई भी जरूरी कदम उठाने का अधिकार दिया है। संभावित दुरुपयोग के संदर्भ में समयावधि एक महत्वपूर्ण सीमा है और इसे यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया कि सरकार इसका इस्तेमाल सिर्फ प्रामाणिक रूप से और अप्रत्याशित परिस्थितियों में करेगी। हालांकि मौजूदा सरकार ने इस समयावधि को बढ़ा कर पांच साल कर दिया है। इससे सरकार को अधिनियम की अपनी व्याख्या का समर्थन करने के लिए किसी जरूरी कदम के लिए बाकी अधिकारों के इस्तेमाल की अनुमति मिली है। 

ये सभी संशोधन उस कानून की भावना के उल्लंघन का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सरकारी तंत्र को नहीं बल्कि सामान्य आदमी को सशक्त और मजबूत बनाए जाने पर केंद्रित है। जबरन अधिग्रहण की व्यवस्था को सीमित करने वाले इस कानून का लक्ष्य काफी हद तक कम आंका गया है।

संशोधन की पृष्ठभूमि और समयावधि

संशोधन की पृष्ठभूमि और समयावधि

29 दिसंबर, 2014 को भारत सरकार की आधिकारिक मीडिया इकाई, प्रेस  इन्फॉर्मैशन ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा इस संबंध में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। इस विज्ञप्ति में बिना किसी तथ्य के यह घोषित किया गया था कि ‘इसके (कानून के) अमल में कई दिक्कतें आ रही हैं।’ विज्ञप्ति में आगे कहा गया, ‘इन दिक्कतों को दूर करने के लिये कानून में कुछ संशोधन किये गये हैं जो ‘प्रभावित परिवारों’ के हितों को सुरक्षित करने वाले प्रावधानों को और मजबूत बनाएंगे।’ इस विज्ञप्ति में उन संशोधनों की सामान्य तस्वीरें पेश की गई। यह आधिकारिक अध्यादेश लाये जाने से दो दिन पहले की बात है जब इसकी जानकारी लोगों को दी गई। प्रेस विज्ञप्ति में यह बताया गया कि सिर्फ दो संशोधन ही किए जाएंगे।

पहला संशोधन कानून में मुआवजे और पुनर्वास एवं पुन:स्थापन के प्रावधान लागू किए जाने के संबंध में, जिसे चौथी अनुसूची के तहत अलग रखा गया था। गैर-संशोधित कानून के अंतर्गत, सिर्फ सहमति और सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट क्लॉज को अलग रखा गया था जिसमें चौथी अनुसूची में 13 कानूनों को शामिल किया गया था। यह व्यवस्था इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक अस्थायी उपाय के तौर पर की गई थी कि कुछ परियोजनाएं जरूरी थीं, और अन्य की तुलना में अधिक योग्य थीं। इस सूची में रेलवे, नेशनल हाईवे, परमाणु ऊर्जा, बिजली आदि के उद्देश्य के लिए अधिग्रहण शामिल थे। यहां तक की इन 13 कानूनों में भी एक साल के भीतर यानी 31 दिसंबर 2014 तक संशोधन किए जाने थे

ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मुआवजा, पुनर्वास और पुन:स्थापन क्लॉज को नए कानून (संशोधित कानून की धारा 105 देखें) के समान लाया जा सके। क्योंकि संशोधन की यह जरूरत कानून में तब शामिल की गई थी जब इसे पारित किया गया और यह पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं थी। दरअसल, यह एक ऐसा जरूरी सुरक्षा उपाय था जिसमें अधिग्रहण विकल्प निर्धारित करने की विभिन्न विधियों के बीच समानता सुनिश्चित करने के लिए किसानों पर ध्यान केंद्रित किया गया था। दूसरा संशोधन उन परियोजनाओं की नई श्रेणी बनाए जाने से संबंधित था जिन्हें प्रभावित परिवारों की सहमति से अलग रखा जाएगा। इन परियोजनाओं को सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट प्रोसेस में निर्धारित

मानकों पर जांचे जाने की भी जरूरत नहीं होगी। इन नई श्रेणियों (नई धारा 10A द्वारा शामिल) में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट (PPP परियोजनाएं शामिल) जैसी अस्पष्ट शब्दावली को शामिल किया गया है। इसके साथ साथ इसमें ग्रामीण  विद्युतीकरण और गरीबों के लिए आवासीय सुविधा के सार्वजनिक उद्देश्यों को शामिल किया गया है। श्रेणी बनाने का औचित्य कभी पेश नहीं किया गया। गैर-संशोधित कानून में दी गई रियायतें लगातार सार्वजनिक परामर्श का परिणाम थीं और कुछ हद तक समझौताकारी भी। अध्यादेश के मामले में, रियायतें बगैर किसी स्पष्टीकरण के ही तैयार की गईं। प्रेस विज्ञप्ति में भ्रामक तौर पर यह भी सुझाव दिया गया कि ये उपाय रक्षा उद्देश्यों के लिए अधिग्रहण को आसान बनाएंगे। हालांकि यह दावा किए जाने के संदर्भ में किसानों ने इस तथ्य की अनदेखी की कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अर्जेंसी क्लॉज के तहत अधिग्रहण पहले से ही सुरक्षित है।

जिस तरीके से संशोधन को पेश किया गया यह अनौपचारिक रुप से उसका एक डरावना पक्ष था।  लोगों की राय लेकर बनाये जाने वाले कानून के लिए कोई मसौदा व्यापक तौर पर लोगों के साथ साझा नहीं किया गया था। लोगों से उनकी राय/टिप्पणी आमंत्रित करने की जरूरत को नजरअंदाज किया गया और कानून को अधिकारियों और मंत्रालय स्तर के प्रतिनिधियों के एक वर्ग द्वारा तैयार किया गया। कई समूहों को इस कानून में संशोधन से पहले अपनी बात रखने के लिये संघर्ष करना पड़ा, लेकिन कुछ को ही इसका अवसर मिला। यह तर्क दिया जा सकता है कि

वे इस संशोधन प्रक्रिया के लिए हिस्सेदार नहीं थे। सरकार के पास संसद में इस विधेयक को पेश करने में विफल रहने के कई कारण थे। संसद के समक्ष इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज पेश नहीं किया गया। जब अध्यादेश की घोषणा हुई और चार दिन के बाद इसे लागू कर दिया गया तो सभी हैरान रह गये। 

भूमि अधिग्रहण कानून

परिचय

 

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन करते हुए भारत सरकार ने 31 दिसंबर, 2014 को एक नया अध्यादेश पेश किया। यहां हम इस कानूनी बदलाव के महत्व और परिणाम की चर्चा करेंगे

नई सरकार के सत्ता संभालने के तुरंत बाद यह साफ हो गया था कि जमीन अधिग्रहण कानून में जल्द बदलाव किए जाएंगे। यह घटनाक्रम राजनीतिक अभियान के जरिये एक मुख्य मुद्दा बन गया और जमीन अधिग्रहण इन चर्चाओं का एक अहम हिस्सा। 
 

लोगों ने इसे काल्पनिक चुनौतियों का रूप दिए जाने से पहले ईमानदारी से अमल में लाए जाने के लिए प्रेस में काफी कुछ लिखा। किसानों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने भी इसको लेकर आवाजें उठाई जिन्होंने सरकार को कानून में संशोधन करने से रोकने के मकसद से रैलियां आयोजित की।

निष्कर्ष

निष्कर्ष

विवाह वास्तव में एक जुआ की तरह है, यदि दांव सही पड़ गया तो जीवन स्वर्ग, अन्यथा नरक के सभी रास्ते यहीं खुल जाते हैं. अच्छा यह हो कि विवाह के लिए जीवनसाथी का चुनाव लड़का-लड़की खुद करे यानी प्रेम विवाह करे और विवाह होते ही कम से कम सात साल तक दोनो अपने-अपने परिवार से अलग आशियाना बसाए. देखा गया है कि पारिवारिक हस्तक्षेप के कारण ही एक लड़का-लड़की का जीवन नरक बन जाता है पारंपरिक अरेंज मैरिज में भी मां-बाप बच्चों की शादी कर देने के बाद उन्हें स्वतंत्र रूप से जिंदगी जीने दें तो दोनों का जीवन सामांजस्य की पटरी पर आसानी से दौड़ पाएगा.

पत्नी द्वारा किया जाने वाला अत्याचार

पत्नी द्वारा किया जाने वाला अत्याचार

अदालत में स्त्री को मिली कानूनी सुरक्षा का माखौल उड़ते भी देखा गया है. अपने पूर्व के प्रेम संबंध, जबरदस्ती विवाह, आपस में सामांजस्य नहीं बैठने या किसी अन्य कारणों से स्त्री इन सात वर्षों में आत्महत्या की धमकी देते हुए पति का मानसिक शोषण करने की दोषी भी पाई गई हैं. जबरदस्ती दहेज प्रताडऩा में पूरे परिवार को फंसाने का मामला आए दिन सामने आता रहता है.

कानूनन स्त्री की सुरक्षा

कानूनन स्त्री की सुरक्षा

क्रिमिनल अमेंडमेंट एक्ट की धारा 498 क के अनुसार, एक विवाहित स्त्री पर उसके पति या उसके रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार या क्रूरता का व्यवहार एक दंडनीय अपराध है। विधि में यह प्रावधान भी है कि विवाह के सात वर्ष के भीतर यदि पत्नी आत्महत्या कर लेती है या उसकी मौत किसी संदिग्ध परिस्थिति में हो जाती है तो काननू के दृष्टिकोण से यह धारणा बलवती होती है कि उसने यह कदम किसी किस्म की क्रूरता के वशीभूत होकर उठाया है.

दहेज है स्त्री धन

दहेज है स्त्री धन

दहेज का अभिप्राय विवाह के समय वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी गई चल-अचल संपत्ति से है। दहेज को स्त्री धन कहा गया है। विवाह के समय सगे-संबंधियों, नातेदारों आदि द्वारा दिया जाने वाला धन, संपत्ति व उपहार भी दहेज के अंतर्गत आता है. यदि विवाह के बाद पति या पति के परिवार वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर दूसरे पक्ष को किसी किस्म का कष्ट, संताप या प्रताडऩा दे तो स्त्री को यह अधिकार है कि वह उक्त सारी संपत्ति को पति पक्ष से वापस ले ले.

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-27 स्त्री को इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है। वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फाजिल अली ने अपने एक फैसले में निर्णय दिया था कि स्त्री धन एक स्त्री की अनन्य संपत्ति है. यह संपत्ति पति पक्ष पर पत्नी की धरोहर है और उस पर उसका पूरा अधिकार है। इसका उगंघन दफा-406 के तहत अमानत में ख्यानत का अपराध है, जिसके लिए जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है। इस निर्णय की वजह से धारा-27 की समुचित व्याख्या हो गई है.

वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति

वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति

कानूनन वैवाहित स्थिति में स्त्री की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया है. वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति देखें तो अक्सर वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष पर दहेज प्रताडऩा, शारीरिक शोषण और पुरुष के पर स्त्री से संबंध जैसे मामले दर्ज कराए जाते हैं, वहीं वर पक्ष द्वारा स्त्री का किसी गैर मर्द से अवैध संबंध, मानसिक प्रताडऩा जैसे मामला दर्ज कराने के मामले देखे गए हैं.वैसे कई बार अदालत में यह भी साबित हुआ है कि वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को तंग करने के लिए अक्सर दहेज के मामले दर्ज कराए जाते हैं। तिहाड़ के महिला जेल में छोटे-से बच्चे से लेकर 90 वर्ष की वृद्धा तक दहेज प्रताडऩा के आरोप में बंद हैं.

विवाह संबंधी अपराध की धारा 493 से 498 तक

विवाह संबंधी अपराध की धारा 493 से 498 तक

*     धारा-493: स्त्री को इस विश्वास में रखकर सहवास कि वह पुरुष उससे विधिपूर्वक विवाहित है.

*     धारा-494: पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा दूसरे के जीवित रहने के बावजूद दूसरा विवाह करना.

*     धारा-495: एक पक्ष द्वारा अपने पूर्ववर्ती विवाह को छुपाकर दोबारा से विवाह करना.

*     धारा- 496: लड़का या लड़की द्वारा छलपूर्ण आशय से विपरीत पक्ष को यह विश्वास दिलाना कि उनका विवाह विधिपूर्वक मान्य नहीं है।

*     धारा-497: जारकर्म.

*     धारा- 498: आपराधिक आशस से किसी पुरुष द्वारा विवाहित स्त्री को फुसलाना .

*     धारा-498 क: किसी विवाहित स्त्री पर पति या पति के नातेदार द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहार.

विवाह

परिचय

 

आए दिन विवाह टूटने की ऐसी कई वजहें पढऩे को मिलती है. अदालतें ऐसे मुकदमों से भरी पड़ी हैं. कहीं वर पक्ष तो कहीं वधु पक्ष शोषण झूठा मुकदमा दर्ज करा रहा है.

 

हिंदू विवाह एक संस्कार है- हिंदूओं में विवाह को संस्कार माना गया है, जिसमें विवाह को जन्म-जन्म का रिश्ता कहा गया है. लेकिन लगता है यह सब अतीत की बातें हैं, क्योंकि अब विवाह में शोषण भी दिखता है, हत्याएं भी होती है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल भी चलता है. यहां हम विवाह के संबंध में विधि द्वारा स्थापित कानून की जानकारी दे रहे हैं ताकि वैवाहिक शोषण से निपटने में इसकी जानकारी लोगों के काम आ सके।

धारा-34

धारा-34

जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियो दवारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है मनो वह कार्य उसी ने किया हो.

संयुक्त दायित्व

संयुक्त दायित्व

भारतीय दंड संहिता में कुछ ऐसे उपबंध है जो एक ऐसे व्यक्ति के दायित्व को निर्धारित करते है जो दूसरे अन्य लोगो के साथ मिलकर कोई अपराध करता है. इस प्रकार के दायित्व को संयुक्त दायित्व कहते है.

संयुक्त् दायित्व को प्रदर्शित करने वाली प्रमुख धाराए  निम्लिखित है. -----

1-धारा- 34 से 38

2-धारा-149

3-धारा-396

4-धारा-460

विषय सूची

विषय सूची

1.     प्रस्तावना

2.     साधारण स्पष्टीकरण

3.     दण्डो के विषय में

4.     साधारण अपवाद

5.     दुष्प्रेरणा के विषय में

5 क  आपराधिक षङ्यंत्र

6.     राज्य के वीरुध अपराधों के विषय में

7.     सेना नौसेना और वायुसेना से संभन्धित अपराधो के विषय में

8.     लोक प्रशांति के वीरुध अपराधो के विषय में

9.     लोक सेवकों द्वारा या उनसे संभन्धित अपराधों केडबल्यू विषय में

9 च   निर्वाचन संबंधी अपराधों के विषय में

10.   लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के विषय में

11.   मिथ्या साक्ष्य और लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के विषय में

12.   सिक्कों और सरकारी स्टाम्पों में संभन्धित अपराधों के विषय में

13.   बाटों ओर मापों से संबंधित अपराधों के विषय में

14.   लोक - स्वास्थ, क्षेम, सुविधा, शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में

15.    धर्म से संभन्धित अपराधों के विषय में

16.    मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में

17.    संपत्ति के विरुद्ध अपराधों के संबंध में

18.    दस्तावेजों और संपत्ति चिन्हों साबंधी अपराधों के विषय में

19.    सेवा सांविदाओ के आपराधिक भंग के विषय में

20.    विवाह संबंधी अपराधों के विषय में

20 क पति या पति के नातेदारों दावरा क्रूरता के विषय में

21.   मानहानि के विषय में

22.   आपराधिक अभित्रास, अपमान और क्षोभ के विषय में

23.   अपराधों को करने के प्रयत्नों के विषय में

भारतीय दण्ड संहिता 1860

भारतीय दण्ड संहिता 1860

 

अधिनियम संख्या 45 जो भारत में 7 अक्टूबर 1860 को लागू हुआ। यह जम्मू कश्मीर के सिवाय सम्पूर्ण भारत में लागू है.

व्यपहरण पर कानून

व्यपहरण पर कानून

(धारा 362, 364, 364क, 365, 366, 367, 369 भारतीय दंड संहिता)

 

व्यपहरणः-

 

किसी बालिग व्यक्ति को जोर जबरदस्ती से या बहला फुसला कर किसी कारण से कहीं ले जाया जाए तो यह व्यपहरण का अपराध है। यह कारण निम्नलिखित हो सकते है। जैसेः- फिरौती की रकम के लिए, उसे गलत तरीके से कैद रखने के लिए, उसे गंभीर चोट पहुँचाने के लिए, उसे गुलाम बनाने के लिए इत्यादि।

 

धारा 366 भारतीय दंड संहिता :-

 

धारा के अन्तर्गत विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को अपहृत करना या उत्प्रेरक करने के बारे में बताया गया है। इसमें बताया गया है कि जो कोई किसी स्त्री का अपहरण या व्यपहरण उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए उस स्त्री को विवश करने के आशय से या यह विवश की जायेगी, यह सम्भाव्य जानते हुए अथवा आयुक्त सम्भोग करने के लिए उस स्त्री को विवश, यह विलुब्ध करने के लिए, यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिनकी अवधि दस वर्ष तक से भी दण्डनीय होगी 

अपहरण पर कानून (धारा 363 क भारतीय दंड संहिता)

अपहरण पर कानून (धारा 363 क भारतीय दंड संहिता)

अपहरणः

 

किसी नाबालिग लड़के, जिसकी उम्र सोलह साल से कम है या नाबालिग लड़की, जिसकी उम्र अट्ठारह साल से कम है, को उसके सरंक्षक की आज्ञा के बिना कहीं ले जाना अपहरण का अपराध है तथा इसके लिए अपराधी को सात साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

 

अगर कोई बहला फुसला कर भी बच्चों को ले जाए तो कहने को तो बच्चा अपनी मर्जी से गया, लेकिन कानून में वह अपराध होगा।

धारा 373 भारतीय दंड संहिता

धारा 373 भारतीय दंड संहिता

वेश्यावृत्ति के प्रयोजन के लिए अप्राप्वय का खरीदना आदि के बारे में हैं जो कोई अठारह वर्ष में कम आयु के किसी व्यक्ति को इस आशय के बारे में है कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति से आयुक्त सम्भोग करने के लिए या किसी विधि विरुध्द दुराचारिक प्रयोजन के लिए काम में लाया या उपयोग किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी ऐसे किसी प्रयोजन के लिए काम में लाया जाएगा या उपभोग किया जाएगा, खरीदेगा, भाड़े पर लेगा या अन्यथा उसका कब्जा अभिप्रेत करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। इस धारा के स्पष्टीकरण के अन्तर्गत बताया गया है कि अठारह वर्ष से कम आयु की नारी को खरीदने वाला, भाड़े पर लेने वाला या अन्यथा उसका कब्जा  करने वाले तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि ऐसी नारी का कब्जा  उसने इस आशय से अभिप्रेत किया है कि वह वेश्यावृत्ति के प्रयोजनों के लिए उपभोग में लायी जाएगी।

धारा 372 भारतीय दंड संहिता

धारा 372 भारतीय दंड संहिता

वेश्यावृत्ति आदि के प्रयोजन के लिए अप्राप्तवय को बेचने के बारे में प्रावधान करती है। इसके अंतर्गत बताया गया है कि जो कोई 18 वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति को इस आशय से कि ऐसा व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए या किसी विधि विरुध्द या दुराचारिक प्रयोजन के लिए कम में लाया या उपयोग किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी ऐसे किसी प्रयोजन के लिए काम में लाया जाएगा, या उपभोग किया जाएगा, बेचेगा, भाड़े पर देगा या अन्यथा व्ययनित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। 

(6 धारा के अन्तर्गत 2 स्पष्टीकरण दिये गये हैं। स्पष्टीकरण 1 के अन्तर्गत बताया गया है कि जबकि अठारह वर्ष से कम आयु की नारी किसी वेश्या को, या किसी अन्य व्यक्ति को, जो वेश्यागृह चलाता हो या उसका प्रबंध करता हो, बेची जाए, भाड़े पर दी जाए या अन्यथा व्ययनित की जाए, तब इस प्रकार ऐसी नारी को व्ययनित करने वाले व्यक्ति के बारे में,जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि उसने उसको इस आशय से व्ययनित किया है कि वह वेश्यावृत्ति के उपभोग में लाई जाएगी। स्पष्टीकरण -2 के अन्तर्गत आयुक्त सम्भोग से इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे व्यक्तियों में मैथुन अभिप्रेत है जो विवाह से संयुक्त नहीं है, या ऐसे किसी सम्भोग या बंधन से संयुक्त नहीं कि जो यद्यपि विवाह की कोटि में तो नहीं आता तथापि इस समुदाय की, जिसके वे हैं या यदि वे भिन्न समुदायों के हैं, जो ऐसे दोनों समुदायों की स्वीय विधि या रूञ्ढ़ि द्वारा उनके बीच में विवाह सदृश्य सम्बन्ध अभिसात किया जाता है।

धारा 366 ख भारतीय दंड संहिता

धारा 366 ख भारतीय दंड संहिता

धारा 366 (ख) के अन्तर्गत विदेश से लड़की को आयात करने के बारे में बताया गया है कम आयु की किसी लड़की का भारत के बाहर उसके किसी देश से या जम्मू-कश्मीर से आयात उसे किसी अन्य व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलुब्ध की जाएगी, यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, वह कारवास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा 366 क भारतीय दंड संहिता

धारा 366 क भारतीय दंड संहिता

धारा 366 क के अन्तर्गत अप्राप्त लड़की को उपादान के बारे में बताया गया है। इसके अन्तर्गत कहा गया है कि जो कोई अठारह वर्ष से कम आयु की अप्राप्तवय लड़की को, अन्य व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलब्ध किया जाएगा, यह सम्भाव्य जानते हुए ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को कोई कार्य करने को, किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेञ्गी दण्डित किया जाएगा और जुर्माना से भी दण्डनीय होगा।

पोक्सो (POCSO)

चर्चा का कारण हाल ही में राज्यसभा ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 {POCSO (Amendment) Bill, 2019} को मंजूरी प्रदान ...