Tuesday, 9 January 2018

badlega police ka chehara

Aaj Ka Vishay बदलेगा पुलिस का चेहरा * उच्चतम न्यायालय की वृहतर पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए संज्ञेय अपराधों के मामले में एफआईआर दर्ज किया जाने को जरूरी बतलाया है। अदालत का कहना था कि संज्ञेय अपराधों में किसी प्राथमिक जांच की अनुमति नहीं है। यदि पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने में अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई, तो इसके सार्वजनिक व्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं और पीड़ितों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से बच नहीं सकते और यदि एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो उनके खिलाफ अवश्य कार्रवाई होनी चाहिए। * एफआईआर आपराधिक न्याय प्रक्रिया का पहला कदम है और इस पहले ही कदम के चलने में फरियादियों को सबसे यादा तकलीफ का सामना करना पड़ता है। थाने में एक अदद एफआईआर लिखाने के लिए उन्हें कई पापड़ बेलने पड़ते हैं। सामान्य अपराध की तो बात ही छोड़ दें, गंभीर अपराधों में भी एफआईआर लिखने में पुलिस का रवैया नानुकुर का होता है। पुलिस की पहली कोषिष होती है कि एफआईआर लिखने को किसी भी तरह से टाला जाए। जब दवाब यादा बढ़ता है, तभी पुलिसकर्मियों की कलम चलती है। हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें पुलिस ने एफआईआर लिखने में खूब हीलाहवाली की। मसलन बीते साल दिसम्बर में राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के चर्चित मामले को भला कौन भूल सकता है, जब पुलिस एफआईआर लिखने की बजाय अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर ही आपस में उलझी रही। जिसकी वजह से एफआईआर दर्ज करने में देर हुई। यही नहीं इसके बाद पूर्वी दिल्ली में पांच साल की एक बच्ची के साथ हुए बलात्कार के मामले में भी पुलिस पर शुरूआत में एफआईआर नहीं दर्ज करने के इल्जाम लगे थे। यह तो महज कुछ चंद मिसाल हैं, वरना इस तरह की घटनाएं देश में रोज ब रोज दोहराई जाती हैं। जिन पर कहीं कोई कार्यवाही नहीं होती। इस परिप्रेक्ष्य में यदि देखें, तो हाल ही में आया उच्चतम न्यायालय का फैसला संज्ञेय अपराधों के मामले में एफआईआर दर्ज किया जाने की अनिवार्यता को पुनऱ् स्थापित करता है। * उच्चतम न्यायालय की वृहतर पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए संज्ञेय अपराधों के मामले में एफआईआर दर्ज किया जाने को जरूरी बतलाया है। अदालत का कहना था कि संज्ञेय अपराधों में किसी प्राथमिक जांच की अनुमति नहीं है। यदि पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने में अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई, तो इसके सार्वजनिक व्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं और पीड़ितों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से बच नहीं सकते और यदि एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो उनके खिलाफ अवश्य कार्रवाई होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने कहा कि सूचना के तार्किकता या विश्वसनीयता मामला दर्ज करने के लिये कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। दंड प्रयिा संहिता के प्रावधानों का जि करते हुए अदालत का कहना था कि कानून में कोई अस्पष्टता नहीं है और कानून की मंशा संज्ञेय अपराधों में अनिवार्य एफआईआर पंजीकरण की है। * संज्ञेय अपराध वे अपराध हैं, जिनमें पुलिस को बिना वारंट के गिरतारी का अधिकार है और अपराधी को तीन साल या इससे अधिक की सजा हो सकती है। कानून के मुताबिक यदि सूचना में संज्ञेय अपराध का पता चलता है, तो पुलिस को तुरंत दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के तहत प्राथमिकी जरूर दर्ज करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं। अलबत्ता जिन शिकायतों में संज्ञेय अपराध होने का पता नहीं चलता, उन मामलों में पुलिस यह पता लगाने के लिए सीमित जांच कर सकती है कि संज्ञेय अपराध घटित हुआ है कि नहीं ? अगर संज्ञेय अपराध का पता नहीं चलता और मामले को बंद करना है, तो इसकी सूचना की एक प्रति शिकायतकर्ता को दी जानी चाहिए और उसमें मामला बंद करने की वजह भी बतलाई जाना जरूरी है। यानी एफआईआर से संबंधित कानून में स्पश्ट प्रावधान होने के बाद भी हमारी पुलिस जांच के बहाने एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती है। आम तौर पर अभी पुलिस ही तय करती है कि शिकायत एफआइआर में तब्दील की जाए या नहीं? यादातर मामलों में वह आरंभिक जांच यानी पीआई दर्ज करती है और बाद में तय करती है कि एफआईआर दर्ज हो या नहीं। यही वजह है कि अदालत ने अपने फैसले में इस बात को साफ कर दिया है कि मामला दर्ज करते समय यह देखना महत्वपूर्ण नहीं है कि सूचना सही है कि गलत या भरोसे लायक है कि नहीं ? इन सारी बातों की जांच मामला दर्ज करने के बाद भी की जा सकती है। अगर जांच के बाद पता चलता है कि शिकायत झूठी है तो शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठी एफआइआर दर्ज करने पर मुकदमा चलाया जा सकता है। * अदालत ने विभिन्न राय सरकारों की इन दलीलों को अस्वीकार कर दिया कि प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी है। क्योंकि कई बार निरर्थक शिकायतें दायर की जाती हैं और इसी आधार पर लोगों के मौलिक अधिकार का हनन करके उनकी गिरतारी भी हो सकती है। संविधान पीठ ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है, जबकि प्राथमिकी दर्ज करने के साथ ही व्यक्ति को गिरतार करना अनिवार्य नहीं है। वास्तव में प्राथमिकी दर्ज करना और आरोपी व्यक्ति को गिरतार करना कानून के तहत अलग अलग मामले हैं और गिरफ्तारी के खिलाफ कई बचाव के उपाय भी हैं। * गौरतलब है कि यह फैसला, दो न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा मामले को वृहतर पीठ के पास भेजे जाने के बाद आया है। पीठ ने इस आधार पर मामले को वृहतर पीठ के पास भेजा था कि इस मुद्दे पर विरोधाभासी फैसले हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने साल 2008 में एक बच्ची के लापता होने की एफआईआर महीने भर बाद दर्ज की थी। बहरहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। जहां जस्टिस बीएन अग्रवाल और एसबीके सिन्हा ने मामले की सुनवाई की। उन्हें लगा कि यह संवैधानिक मुद्दा है। लिहाजा उन्होंने मामले को वृहतर पीठ के पास विचार के लिए भेज दिया। प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने मामले से जुड़े सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि परिवार विवाद, वैवाहिक झगड़े, इलाज में लापरवाही, व्यापारिक विवाद, भ्रष्टाचार जैसे मामलों में शिकायत मिलने पर पुलिस एक सप्ताह के भीतर प्रारंभिक जांच कर सकती है। अगर संज्ञेय अपराध का पता नहीं चलता और मामले को बंद करना है, तो इसकी सूचना की एक प्रति शिकायतकर्ता को दी जाए और उसमें मामला बंद करने की वजह भी बतलाई जाए। यही नहीं पुलिस हर शिकायत को अपने रोजनामचे में दर्ज करे। * यह पहली बार नहीं है, जब एफआईआर के संबंध में दिशा-निर्देश आए हों, बल्कि अभी यादा दिन नहीं बीते हैं, जब केन्द सरकार ने सभी रायों और संघशासित क्षेत्रों को कड़े निर्देश जारी कर कहा था कि यदि कोई पुलिसकर्मी किसी नागरिक की शिकायत दर्ज करने से इंकार करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। निर्देशों का साफ-साफ मजमून था कि पुलिसकर्मियों को शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिहाज से संवेदनशील होना चाहिए। फिर वह चाहे शिकायत किसी पुरूष की ओर से हो या फिर महिला की ओर से। यदि फिर भी कोई पुलिसकर्मी किसी नागरिक की शिकायत दर्ज करने से इंकार करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। यानी किसी संज्ञेय अपराध के बारे में एफआईआर दर्ज करने से इंकार करना, भारतीय दंड संहिता की धारा 166-ए के तहत ऐसा अपराध है, जिसके लिए पुलिसकर्मियों को छह माह से एक साल तक कैद हो सकती है। सजा के अलावा जुर्माना अलग। * दरअसल एफआईआर दर्ज न करने की एक बड़ी वजह, पुलिस की यह सोच है कि एफआईआर दर्ज होंगी, तो सरकार को लगेगा कि उक्त थाना क्षेत्र में अपराध बढ़ रहे हैं। और कोई भी सरकार, कभी नहीं चाहती कि अपराध बढ़ें। एक बात और यदि अपराध दर्ज होंगे, तो यह माना जाएगा कि पुलिस अपनेर् कत्तव्यों का सही तरह से निर्वहन नहीं कर रही है और उसके क्षेत्राधिकार में अपराध नियंत्रण में नहीं है। यहीं नहीं जब मामले दर्ज होंगे, तो उन्हें सुलझाने का दवाब अलग होगा। लिहाजा पुलिस ने इन सब बातों से निपटने के लिए एक आसान रास्ता खोज लिया है कि एफआईआर कम से कम दर्ज हों। न एफआईआर दर्ज होंगी, न अपराध को सुलझाने का दवाब होगा। बीते तमाम तजुर्बों से एक बात और सामने आई है कि क्षेत्राधिकार विवाद के चलते होने वाली देरी से कई मामलों में अहम सबूत नष्ट हो जाते हैं। पुलिस फरियादी को क्षेत्राधिकार का बहाना लेकर एफआईआर दर्ज करने में टालामटोली करती रहती है और इस बीच अपराधी मामले से संबंधित पूरे सबूत खत्म कर देता है। * जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशों के मुताबिक आपराधिक नियम (संशोधान) कानून-2013 के संसद में पारित होने के साथ पहले ही पूरे देष में एफआईआर संबंधी नए प्रावधान अस्तित्व में आ गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा रायों को भेजे गए दिशा-निर्देशों में भी पुलिस महकमे को अपनी कार्यप्रणाली सुधारने की चेतावनी दी गई थी। अब उच्चतम न्यायालय ने भी अपने फैसले में कमोबेश उन्हीं बातों को दोहराया है। एफआईआर आपराधिक न्याय प्रयिा का पहला कदम है और इसमें जरा सी भी कोताही या ढील इंसाफ की राह में रोड़ा बन जाती है। लिहाजा यह निश्चित होना ही चाहिए कि पीड़ित की शिकायत पर पुलिस तुरंत कार्यवाही करे, जिससे कि उसे जल्द ही इंसाफ मिल सके। उच्चतम न्यायालय के हालिया दिशा-निर्देशों के बाद एक बार फिर यह उम्मीद बंधी है कि पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली में बदलाव आएगा और वह अपने कार्य के प्रति और भी यादा ईमानदार होगी।

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