Thursday, 11 January 2018
nirvah bhatte se jude kuchh kanoon
Aaj Ka Vishay
जानिए निर्वाह भत्ते से जुड़े कुछ कानून
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 से 128 तक उन प्रावधानों का उल्लेख किया गया जिसके आधार पर किसी भी व्यक्ति को ..उसके आश्रितों को निर्वाह खर्चा / गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य किया जा सकता है। दरअसल इस कानून के पीछे अवधारणा ये है की प्र्तात्येक व्यक्ति का ये मौलिक और नैतिक कर्त्तव्य है की वो अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता, अभिभावकों की देखभाल करे..यदि वे अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं तो .... इसके पीछे विचार ये है की कोई भी माता-पिता, पत्नी, और संतान इन हालातों में मजबूर हो कर न रहे की ..विवश होकर वो अपराध ..में ही लिप्त हो जाए..या किसी और का मोहताज बन जाए।
धारा 125 के अनुसार कोई सक्षम व्यक्ति उनका भरण-पोषण करने में आनाकानी करता है:
1। उसकी पत्नी, जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो ...
2। उस व्यक्ति की वैध / अवैध अवयस्क ... विवाहित / अविवाहित संतान ..जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो ...
3। उस व्यक्ति की वैध / अवैध संतान (विवाहित पुत्री नहीं) जो बालिग़ तो हैं, ... किन्तु किसी भी तरह की शारीरिक, मानसिक, अक्षमता से ग्रस्त हो .....
4। उसके माता -पिता, जो अपनी देखभाल करने में अक्षम हों ....
तो उस स्थिति में ..प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी उस व्यक्ति को ये आदेश दे सकती है की वो एक निश्चित राशि, प्रति माह, उन्हें गुजारा भत्ते के रूप में अदा करे ...
इसके तहत वर्ष 2001 में शंशोधन करके ये कानून भी बना दिया गया की अदालत धारा 125 की याचिका की सुनवाई करते हुए ..एक निश्चित राशि को अंतरिम खर्चे / राहत के रूप में निर्धारित करके उस व्यक्ति को उसके भुगतान का आदेश दे सकती है .. जब तक की उस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता.और ये अंतिम खर्चे का निर्धारण मुदालय को याचिका प्राप्त होने के साठ दिनों इके अन्दर अन्दर कर दिया जाना चाहिए ....
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