प्राचीन भारत >> वैदिक साहित्य : 1397. अथर्ववेद :- -अथर्ववेद की ‘रचना’ अर्थवा झषि ने की थी । -अथर्ववेद के अधिकांश मंत्रों का संबंध तंत्र-मंत्र या जादू-टोने से है। -रोग निवारण की औषधियों की चर्चा भी इसमें मिलती है। -अथर्ववेद के मंत्रों को भारतीय विज्ञान का आधार भी माना जाता है। -अथर्ववेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है। -सर्वोच्च शासक को अथर्ववेद में एकराट् कहा गया है। सम्राट शब्द का भी उल्लेख मिलता है। -सूर्य का वर्णन एक ब्राह्मण विद्यार्थी के रूप में किया गया है। -उपवेद, वेदों के परिशिष्ट हैं जिनके जरिए वेद की तकनीकी बातों की स्पष्टता मिलती है। -वेदों की क्लिष्टता को कम करने के लिए वेदांगों की रचना की गई । -शिक्षा की सबसे प्रामाणिक रचना प्रातिशाख्य सूत्र है । -व्याकरण की सबसे पहल तथा व्यापक रचना पाणिनी की अष्टाध्यायी है। -ऋषियों द्वारा जंगलों में रचित ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है। -वेदों की दार्शनिक व्याख्या के लिए उपनिषदों की रचना की गई । -उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है। -उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है एकान्त में प्राप्त ज्ञान । -यम तथा नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद की कथा कठोपनिषद् में वर्णित है। -श्वेतकेतु एवं उसके पिता का संवाद छान्दोग्योपनिषद में वर्णित है। -भारत का सूत्र वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
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