Friday, 12 January 2018

धारा 110

धारा 110

ग्राम कचहरी की न्यायपीठ की विशिष्ट सिविल अधिकारिता- उपधारा (1) बंगाल, आगरा और असम सिविल न्यायलय अधिनियम 1887 (13, 1883), प्रान्तीय लधु हेतु न्यायालय अधिनियम, 1887 (9, 1887) और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5, 1908) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी तथा इस अधिनियम के प्रावधानों के अध्याधीन ग्राम कचहरी की न्यायापीठ को निम्नलिखित श्रेणी के वादों को सुनने और अवधारित करने की अधिकार होगा, अर्थात्

 

(क)   जबकि ग्राम कचहरी न्यायपीठ के समक्ष दर्ज किये गये मुकदमों का मूल्य दस हजार रूपये से अधिक न हो-

 

¼ i)    संविदा पर देय धन के लिए वाद:

 

(ii)    चल सम्पत्तिा या ऐसी सम्पत्तिा के मूल्य की वसूली के वाद:

 

(iii)   लगान वसूली के लिए वाद, और

 

(iv)   चल सम्पत्तिा को सदोष ग्रहण करने या उसे क्षति पहँचाने के वास्ते प्रतिकार के लिए, या पशु-अतियार से क्षति ग्रस्त सम्पति के लिए वाद:

 

(ख)   वाद बटवारा के सभी मामला सिवाय एन वादों के जहाँ विधि का जटिल प्रश्न या टाईटिल अन्तर्ग्रस्त हो:

 

      किन्तु जहाँ ग्राम कचहरी न्यायपीठ के विचार में किसी बँटवारा के किसी वाद में विधि का जटील प्रश्न या टाईटली का मामला सन्निहित है तो ग्राम कचहरी न्यायपीठ ऐसे वाद को समक्ष अधिकारिता वाले न्यायालय को अन्तरित कर देगी।

 

      परन्तु खण्ड (क) एवं खण्ड के अधीन उपर्युक्त प्रकार के वाद के पक्षकार वाद के मूल्य को ध्यान में रखे बिना, लिखित करार द्वारा निर्णय के लिए न्यायपीठ के समक्ष वाद निर्दिष्ट कर सकोगा और न्यायपीठ की कोर्ट फीस और अन्य मामलें के सम्बन्ध में, इस अधिनियम के अधीन, यथा विहित नियमों के अध्याधीन उक्त वाद की सुनवाई करने और उसकी अवधारणा करने की अधिकारिता होगी।

 

नियम 20 :-  सरपंच, अधिनियम की धारा 110 के उपबंधों के अधीन उन मुकदमों को ही स्वीकार करेगा जो कि मुकदमा चलने की पूरा या आंशिक काम ग्राम कचहरी क क्षेत्राधिकार की स्थानीय सीमा के अन्दर हुआ है या प्रतिवादी (यानी जिसपर मुकदमा दर्ज किया गया) वह उस कार्य क्षेत्र के अन्दर रहता हो या कोई कारोबार, व्यवसाय किये हो या करता हो,

 

नियम 21 :-  उपनियम (1)- पंचायत अधिनियम के अधीन कोई भी (सूट) वाद या मुकदमा वादी द्वारा लिखित आवेदन देकर ही दायर किया जायेगा जो आवेदन वादी द्वारा दायर किया जायेगा उस वाद में पक्षों का नाम, जिस सम्पत्तिा का (मुकदमा) वाद किया जा रहा हो उसका मुल्य, वैसी बातें जिस मुख्य बातों पर उक्त वाद निर्भर करता हो, उसका संक्षिप्त विवरण तथा जिन सुविधाओं के लिए वाद लाया गया है उन बातों का उल्लेख अनिवार्य रूप से लिखित होगा।

 

उपनियम (2)- इस नियम के अधीन कोई भी आवेदन स्वीकार करने के पूर्व ग्राम कचहरी का सचिव वाद की रकम के अनुसार दस रूपया दर या उसके किसी अंश के लिए एक रूपये की दर से नकद फीस वादी द्वारा वसूल करेगा।

 

नियम 22 :-  सरपंच के पास जैसे ही वाद दायर किया जाय वाह इस बात का निर्णय करेगा कि उक्त वाद का विचारण (ट्रायल) इस अधिनियम में उल्लेखित न्यायपीठ द्वारा होगा या नहीं। यदि सरपंच के द्वारा यह समाधान हो जाय कि उक्त वाद का विचारण ग्राम कचहरी न्यायपीठ के क्षेत्राधिकार में नहीं आता है वह वादी को आवेदन वापस कर देगा और उसे यह बात बता देगा कि उक्त वाद के लिए सही क्षेत्राधिकार वाला न्यायालय कौन सा है और उक्त बात का उल्लेख ग्राम कचहरी न्यायपीठ आवेदन पर कर देगा। परन्तु वादी का आवेदन वापस करने के आदेश देने के पहले आवेदक को अपना बात करने का, सुनाने का यूक्ति यूक्त अवसर दिया जायेगा।

 

नियम 23 :-  नियम (31) के अधीन वादी आवेदन के अलावे उतनी प्रतियाँ के साथ आवेदन पद न्यायपीठ के समक्ष प्रस्तुत करेगा जितना की उक्तवाद प्रतिवादी (डिफोन्‍उन्ट) होगा।

 

नियम 24 :-  यदि सरपंच नियम-22 के अनुसार आवेदन आवेदक को वापस न करें और प्रतिवादी या प्रतिवादीगण न्यायपीठ के समक्ष उपस्थित नहीं हो तो वह जितने उक्त वाद में प्रतिवादी के अनुसार उतनी हीं प्रतियों के साथ उसके नाम से सम्मन जारी करेगा और उक्त सम्मन में यह लिखा जायेगा कि वह निश्चित तिथि को नित समय पर ग्राम-कचहरी में हाजिर होकर अपना कारण बताये कि (शोकौज) की वादी का आवेदन का दावा क्यों नहीं न्यायपीठ द्वारा मंजूर कर ली जाय।

 

नियम 25 :-  यदि नियम 24 के अधीन जारी सम्मन का पालन करते हुए प्रतिवादी अधिनियम की धारा 117 के अधीन स्वंय या अपने प्रधिकृत व्यक्ति के जरिए ग्राम-कचहरी में हाजिर न हो तो ऐसी अवस्था में न्यायपीठ उक्त वाद का सुनवाई एक तरफा (एक पक्षीय) कर सकती है।

 

नियम 26 :-  यदि न्यायपीठ के समक्ष कोई दस्तावेज (कागज-पत्र) वादी या प्रतिवादी के द्वारा पेश किया जाता है तो पेश करने वाला उक्त दस्तावेज का नकल देकर उस मुल दस्तावेज को वापस ले सकता है वर्षों  कि उक्त नकल का मिलान मुख्य दस्तावेज से मिलान करने के बाद सरपंच यह समझ ले कि वास्तव में उक्त नकल मूल दस्तावेज का सही प्रतिलिपि एवं हुबहू है।

 

नियम 27 :-  उपनियम-(1)- ग्राम कचहरी न्यायपीठ बाद के सम्बन्ध में पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से डिक्री देने का निर्णया करें तो उस निर्णय में अग्रलिखित बातों का ब्योरा अवश्य देगा:

 

(क)   वाद से संबंधित पक्षों का नाम, पिता का नाम और पता

 

(ख)   दावा और दावा का विवरण

 

(ग)   वाद में खर्च सहित रकम की डिक्री दी गई हो तो वह रकम या कोई अन्य रिलिफ जो वाद में दी गई है और मजूर क गई ब्याज की रकम उपनियम-(2) यदि न्यायापीठ कुछ रूपये पैसे चुकाने का या कोई चल सम्पति प्रदान करने का आदेश दे तो वह न्यायपीठ अपने फैसले में एक तारीख निश्चित कर देगी और जब उक्त रकम या चल सम्पति न्यायपीठ के समक्ष उक्त पक्ष को चुकाई या दी जायेगी तो निर्णय के अनुसार जो इसका पाने का हकदार है और इस तरह का भुगतान या चल सम्पत्तिा प्रदान करने की बात न्यायपीठ अपने उक्त (बेंच) न्यायपीठ के आदेश पत्र में अंकित कर देगी तथा जो व्याक्ति उक्त राशि या चल सम्पत्तिा का भुगतान पायेगा वह प्राप्ति के लिए एक रसीद लिख देगा जो कि वाद के मूल रिकार्ड के साथ सुरक्षित रखी जायेगी।

 

      उपनियम-(i) यदि इस भुगतान या प्रदान किस्तों में किया जाने वाला हो तो फैसले में हर किश्म क तारीख निश्चिम कर दी जायेगी।

 

      उपनियम-(ii) रूपये की दावे की दशा में, ग्राम कचहरी का न्यायापीठ के फैसले में छ: प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर से लिखी जा सकेगी।

 

और जिस तारीख की उस रकम का दावा दायर किया गया हो, उसक तारीख से लेकर डिक्री की रकम वसूल होने के तारीख तक ऐसी ब्याज निर्णात ऋणी ( जनमेन्ट डेटर ) से वसूल किया जायेगा।

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