धारा-110 ग्राम कचहरी की न्यायपीठ की अनन्य सिविल अधिकारिता
उपधारा (1) बंगाल आगरा और असम सिविल न्यायालय अधिनियम 1887, (13, 1887), प्रान्तीय लधु हेतुक न्यायालय अधिनियम, 1887 (89, 1887) और सिविल प्रकिया संहिता, 1908, (5, 1908) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी तथा इस अधिनियिम के प्रावधानाें के अध्याधीन, ग्राम कचहरी की न्यायापीठ की निम्निलिखित श्रेणी के वादों को सुनने और अवधारित करने का अधिकार होगा, अर्थात्-
(क) जब कि ग्राम कचहरी में दर्ज किये गये मुकदमों का मूल्य दस हजार रूपये से अधिक ने हो यथा।
¼i) संविदा पर देय धन के लिए वाद:
¼ii) चल सम्पत्तिा या ऐसी सम्पति के मूल्य की वसूली के लिए वाद:
¼iii) लगान की वसूली के वाद: और
(iv) चल सम्पत्तिा को सदोष ग्रहन करने या उसे क्षति पहँचाने के चलते प्रतिकार के लिए, या पशु-अतिचार से क्षतिग्रस्त सम्पत्तिा के लिए वाद।
(ख) वाद बंटवारा के सभी मामलों, सिवाय उन वादों के जहाँ विधि का जटिल प्रश्न या टाइटिल अंतर्ग्रस्त हो:।
किन्तु, जहाँ ग्राम कचहरी का विचार में किसी बँटवारा के किसी वाद में विधि का जटिल प्रश्न या टाईटिल का मामला सन्निहित है तो ग्राम कचहरी ऐसे वाद को समक्ष अधिकारता वाले न्यायालय को अन्तरित कर देगी: परन्तु खण्ड (क) एवं खण्ड (ख) के अधीन उपर्युक्त प्रकार के वाद के पक्षकार, वाद के मूल्य को ध्यान में रखे बिना, लिखित करार द्वारा निर्णय के लिए न्यायपीठ को वाद निर्दिष्ट कर सकेगा और न्यायपीठ को काई नियमों के अध्याधीन उक्त वाद की सुनवाई करने ओर उसकी अवधारणा करने की अधिकारिता होगी।
No comments:
Post a Comment